
हरदा। बैंक ऑफ इंडिया की मसनगांव शाखा में शनिवार को बैंक राष्ट्रीयकरण की 56वीं वर्षगांठ बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाई गई। इस अवसर पर M.P.E.B.A. के संयुक्त सचिव, कुलदीप ओझा ने राष्ट्रीयकरण के ऐतिहासिक महत्व पर प्रकाश डाला।
कुलदीप ओझा ने बताया कि वर्ष 1969 से पहले, देश के सभी बड़े निजी बैंकों का स्वामित्व और नियंत्रण मुट्ठी भर शक्तिशाली उद्योगपतियों और व्यापारिक घरानों, जैसे कि टाटा समूह और बिरला समूह, के हाथों में था। उन्होंने जानकारी दी कि हमारी यूनियन AIBEA ने 1946 से ही बड़े बैंकों के राष्ट्रीयकरण और उन्हें सरकार के अधीन लाने की मांग को लेकर संघर्ष किया था।

आखिरकार, इस संघर्ष का परिणाम 1969 में देखने को मिला जब 14 निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया। इसके बाद, 1980 में छह अन्य निजी बैंकों को भी राष्ट्रीयकृत बैंकों में शामिल किया गया। इस ऐतिहासिक निर्णय ने देश की बैंकिंग व्यवस्था के पूरे ढांचे को बदल दिया और दो मुख्य उद्देश्यों को पूरा किया:
- बैंकिंग सेवाओं का विस्तार: बैंकिंग सेवाओं को ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों तक पहुँचाया गया, जिससे समाज के बड़े हिस्से को वित्तीय समावेशन का लाभ मिला।
- प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को ऋण: कृषि, लघु उद्योग, स्वरोजगार, शिक्षा और कुटीर उद्योग जैसे प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को ऋण उपलब्ध कराया गया, जिससे देश के आर्थिक विकास को गति मिली। इस अवसर पर, सभी उपस्थित लोगों ने यह संकल्प लिया कि वे निजीकरण के हर प्रयास का यथासंभव विरोध करेंगे। कुलदीप ओझा ने जोर दिया कि हर नागरिक को यह समझना होगा कि बैंक “उनका” है, और इसलिए इसे निजीकरण से बचाए रखना हम सभी का कर्तव्य है। कार्यक्रम के दौरान, शाखा प्रबंधक श्री कृष्णा शुक्ला ने किसान दिवस के बारे में भी जानकारी साझा की। इस समारोह में जितेंद्र जेना, सौरम पाल, राधेश्याम भायरे, अविनाश ओनकर, राकेश पुनासे, दीपक, संजय पाटिल और अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।

